आतंक और क्षमा
9:28 AM Edit This 1 Comment »अत्याचार सहन करने का कुफल यही होता है,
पौरुष का आतंक मनुज कोमल होकर खोता है।
उसको क्या, जो दन्तहीन,विषरहित, विनीत, सरल हो ?
तीन दिवस तक पन्थ माँगते रघुपति सिन्धु-किनारे,
बैठे पढते रहे छन्द अनुनय के प्यारे-प्यारे।
उत्तर में जब एक नाद भी उठा नहीं सागर से,
उठी अधीर धधक पौरुष की आग राम के शर से।
सिन्धु देह धर 'त्राहि-त्राहि' करता आ गिरा शरण में,
चरण पूज, दासता ग्रहण की, बँधा मूढ बन्धन में।
सच पूछो, तो शर में ही बसती है दीप्ति विनय की,
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का जिसमें शक्ति विजय की।
सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है,
बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है।
जहाँ नहीं सामर्थ्य शोध की, क्षमा वहाँ निष्फल है।
गरल-घूँट पी जाने का मिस है, वाणी का छल है।
फलक क्षमा का ओढ छिपाते जो अपनी कायरता,
वे क्या जानें ज्वलित-प्राण नर की पौरुष-निर्भरता ?
वे क्या जानें नर में वह क्या असहनशील अनल है,
जो लगते ही स्पर्श हृदय से सिर तक उठता बल है?
1 comments:
wah kya baat hai! kya yeh aapne likha hai??
Post a Comment