गाँव गया था गाँव से भागा

1:30 PM Edit This 1 Comment »
कैलाश गौतम जी की कविता, जो बचपन में सुनी और आज पुनः स्मृत हुई -

गाँव गया था गाँव से भागा

गाँव गया था गाँव से भागा
रामराज का हाल देखकर, पंचायत की चाल देखकर
आँगन में दीवाल देखकर, सिर पर आती डाल देखकर
नदी का पानी लाल देखकर, और आँख में बाल देखकर
गाँव गया था गाँव से भागा।

गाँव गया था गाँव से भागा
सरकारी स्कीम देखकर, बालू में से क्रीम देखकर
देह बनाती टीम देखकर, हवा में उड़ता भीम देखकर
सौ-सौ नीम हकीम देखकर, गिरवी राम रहीम देखकर
गाँव गया था गाँव से भागा।

गाँव गया था गाँव से भागा
जला हुआ खलिहान देखकर, नेता का दालान देखकर
मुस्काता शैतान देखकर, घिघियाता इंसान देखकर
कहीं नहीं ईमान देखकर, बोझ हुआ मेहमान देखकर
गाँव गया था गाँव से भागा।

गाँव गया था गाँव से भागा
नए धनी का रंग देखकर, रंग हुआ बदरंग देखकर
बातचीत का ढंग देखकर, कुएँ-कुएँ में भंग देखकर
झूठी शान उमंग देखकर, पुलिस चोर के संग देखकर
गाँव गया था गाँव से भागा।

गाँव गया था गाँव से भागा
बिना टिकट बारात देखकर, टाट देखकर भात देखकर
वही ढाक के पात देखकर, पोखर में नवजात देखकर
पड़ी पेट पर लात देखकर, मैं अपनी औकात देखकर
गाँव गया था गाँव से भागा।

गाँव गया था गाँव से भागा
नए नए हथियार देखकर, लहू-लहू त्योहार देखकर
झूठ की जै जैकार देखकर, सच पर पड़ती मार देखकर
भगतिन का श्रृंगार देखकर, गिरी व्यास की लार देखकर
गाँव गया था गाँव से भागा।

गाँव गया था गाँव से भागा
मुठ्ठी में कानून देखकर, किचकिच दोनों जून देखकर
सिर पर चढ़ा जुनून देखकर, गंजे को नाखून देखकर
उजबक अफलातून देखकर, पंडित का सैलून देखकर
गाँव गया था गाँव से भागा।

हिन्दी ब्लॉग

1:07 PM Edit This 0 Comments »
हिन्दी ब्लॉग के संसार में प्रथमागमन।
विषयों की कोई कमी नही, फ़िर भी किस विषय पर लिखूं?
गत कई दिनों से सुन रहा गोस्वामी तुलसीदास रचित और गुंडेचा बन्धु द्वारा स्वर-बद्ध "घन घमंड" ही यही पे टीप देता हूँ -

घन घमंड नभ गरजत घोरा, प्रिया हीन डरपत मन मोरा
दामिनि दमक रह न घन माहीं, खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं
बरषहिं जलद भूमि निअराएँ, जथा नवहिं बुध विद्या पाएँ
बूंद अघात सहहिं गिरि कैसे, खल के बचन संत सह जैसें
क्षुद्र नदीं भर चलीं तोराई, जस थोरेहुँ धन खल इतराई
भूमि परत भा ढाबर पानी, जनु जीवहि माया लपटानी
समिटि समिटि जल भरहिं तलावा, जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा
सरिता जल जलनिधि महुँ जाई, होइ अचल जिमि जिव हरि पाई

अवधी ज्ञान सीमित होने के कारण जैसे तैसे तो उपर्युक्त छंद का अर्थ समझ में आया। लेकिन समझने के बाद ही वास्तविक सौंदर्य प्रकट हुआ। और फिर ध्रुपद में यही छंद सुनने से अतिरेक आनंद की प्राप्ति हुई।