हिन्दी ब्लॉग
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हिन्दी ब्लॉग के संसार में प्रथमागमन।
विषयों की कोई कमी नही, फ़िर भी किस विषय पर लिखूं?
गत कई दिनों से सुन रहा गोस्वामी तुलसीदास रचित और गुंडेचा बन्धु द्वारा स्वर-बद्ध "घन घमंड" ही यही पे टीप देता हूँ -
घन घमंड नभ गरजत घोरा, प्रिया हीन डरपत मन मोरा
दामिनि दमक रह न घन माहीं, खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं
बरषहिं जलद भूमि निअराएँ, जथा नवहिं बुध विद्या पाएँ
बूंद अघात सहहिं गिरि कैसे, खल के बचन संत सह जैसें
क्षुद्र नदीं भर चलीं तोराई, जस थोरेहुँ धन खल इतराई
भूमि परत भा ढाबर पानी, जनु जीवहि माया लपटानी
समिटि समिटि जल भरहिं तलावा, जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा
सरिता जल जलनिधि महुँ जाई, होइ अचल जिमि जिव हरि पाई
अवधी ज्ञान सीमित होने के कारण जैसे तैसे तो उपर्युक्त छंद का अर्थ समझ में आया। लेकिन समझने के बाद ही वास्तविक सौंदर्य प्रकट हुआ। और फिर ध्रुपद में यही छंद सुनने से अतिरेक आनंद की प्राप्ति हुई।
विषयों की कोई कमी नही, फ़िर भी किस विषय पर लिखूं?
गत कई दिनों से सुन रहा गोस्वामी तुलसीदास रचित और गुंडेचा बन्धु द्वारा स्वर-बद्ध "घन घमंड" ही यही पे टीप देता हूँ -
घन घमंड नभ गरजत घोरा, प्रिया हीन डरपत मन मोरा
दामिनि दमक रह न घन माहीं, खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं
बरषहिं जलद भूमि निअराएँ, जथा नवहिं बुध विद्या पाएँ
बूंद अघात सहहिं गिरि कैसे, खल के बचन संत सह जैसें
क्षुद्र नदीं भर चलीं तोराई, जस थोरेहुँ धन खल इतराई
भूमि परत भा ढाबर पानी, जनु जीवहि माया लपटानी
समिटि समिटि जल भरहिं तलावा, जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा
सरिता जल जलनिधि महुँ जाई, होइ अचल जिमि जिव हरि पाई
अवधी ज्ञान सीमित होने के कारण जैसे तैसे तो उपर्युक्त छंद का अर्थ समझ में आया। लेकिन समझने के बाद ही वास्तविक सौंदर्य प्रकट हुआ। और फिर ध्रुपद में यही छंद सुनने से अतिरेक आनंद की प्राप्ति हुई।
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